
हिंदी में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और लोगों को जागरूक करने में प्रतिबद्ध मेरे मित्र और गुरु बलदेवराज दावर जी की ये कविता मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। दावर जी देश की ऐसे अकेले और अदभुत विद्वान हैं जिन्होंने विज्ञान गीता की रचना की है। प्रस्तुत कविता विज्ञान गीता से ही है -
जिस खाल के अंदर तू रहता है,
वह तेरे सैल्फ की सीमा नहीं।
जिस काल में तू जी रहा है,
वह भी तेरी हस्ती की पहली या आख़िरी घड़ी नहीं।
तू अपने को क्षुद्र या क्षण-भंगुर प्राणी न समझ।
तू अकेला नहीं; तू अलग नहीं; न ही तू स्वतंत्र है।
तेरी हर धड़कन, तेरी हर साँस; और तेरी हर सोच
समूचे प्राणीजगत की धड़कनों, सांसों और सोचों का एक हिस्सा है।
... इस लिए, हे अर्जुन, जिस जल की तू मछली है
उस जल को अपने शरीर से पोंछने की बेकार कोशिश न कर।
कछुए की तरह अपने को समेटने की चेष्टा न कर।
बल्कि अपने को ढीला छोड़ दे।
जिस सरोवर में तू रहता है उसमें अपने को शरबत की तरह घोल दे।
फिर देख अपने विराट और विशाल रूप को
और महसूस कर कि तेरा विस्तार कहाँ तक फैला हुआ है।
साभार,
बलदेव राज दावर कृत'विज्ञान गीता' के १८वेँ अध्याय से
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