मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

सावधान, गिर रहा है अंतरिक्ष से मलबा !



सेंटर फॉर ऑरबिटल एंड रीइंट्री डेबरीज स्टडीज ने खबर दी है कि अगले 48 घंटों के भीतर अंतरिक्ष मलबे के दो बड़े टुकड़े पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सकते हैं। इनमें से एक है 2000 किलोग्राम वजनी सेंटॉर रॉकेट का बेकार हिस्सा और दूसरा है 2500 किलोग्राम वजनी डेल्टा-3 रॉकेट का एक बेकार हिस्सा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि सेंटॉर रॉकेट का मलबा 3 फरवरी को और डेल्टा-2 रॉकेट का मलबा 4 फरवरी को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर रहा है। पृथ्वी के तीन-चौथाई हिस्से में पानी है इसलिए हमें इससे घबराने की जरूरत नहीं है, उम्मीद है कि अंतरिक्ष से आ रहा ये मलबा समंदर में ही कहीं आ गिरेगा। लेकिन फिरभी वैज्ञानिक ग्राउंड ट्रैकिंग सिस्टम से इस गिरते हुए मलबे पर निगाहें जमाए हुए हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती पर गिर रहे इन मलबों से घबराने की जरूरत इसलिए भी नहीं है, क्योंकि वायुमंडल में प्रवेश करते ही ये धधक उठेगें और इनका ज्यादातर हिस्सा या तो भाप बनकर उड़ जाएगा...या फिर ये भी हो सकता है कि एक धमाके के साथ ये कई टुकड़ों में बंट जाए।

तू अकेला नहीं


हिंदी में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और लोगों को जागरूक करने में प्रतिबद्ध मेरे मित्र और गुरु बलदेवराज दावर जी की ये कविता मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। दावर जी देश की ऐसे अकेले और अदभुत विद्वान हैं जिन्होंने विज्ञान गीता की रचना की है। प्रस्तुत कविता विज्ञान गीता से ही है -


जिस खाल के अंदर तू रहता है,

वह तेरे सैल्फ की सीमा नहीं।

जिस काल में तू जी रहा है,

वह भी तेरी हस्ती की पहली या आख़िरी घड़ी नहीं।

तू अपने को क्षुद्र या क्षण-भंगुर प्राणी न समझ।

तू अकेला नहीं; तू अलग नहीं; न ही तू स्वतंत्र है।

तेरी हर धड़कन, तेरी हर साँस; और तेरी हर सोच

समूचे प्राणीजगत की धड़कनों, सांसों और सोचों का एक हिस्सा है।

... इस लिए, हे अर्जुन, जिस जल की तू मछली है

उस जल को अपने शरीर से पोंछने की बेकार कोशिश न कर।

कछुए की तरह अपने को समेटने की चेष्टा न कर।

बल्कि अपने को ढीला छोड़ दे।

जिस सरोवर में तू रहता है उसमें अपने को शरबत की तरह घोल दे।

फिर देख अपने विराट और विशाल रूप को

और महसूस कर कि तेरा विस्तार कहाँ तक फैला हुआ है।


साभार,

बलदेव राज दावर कृत'विज्ञान गीता' के १८वेँ अध्याय से