गुरुवार, 22 जनवरी 2009

पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में छेद


हमारी प्यारी धरती का रक्षा कवच टूट रहा है। ओजोन पर्त के बाद अब पृथ्वी का एक और रक्षा कवच खतरे में है। ये रक्षा कवच है पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र। ताजा जानकारी ये है कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में भी छेद हो रहे हैं। अंतरिक्ष से पृथ्वी की निगरानी कर रहे नासा के इमेजर फार मैग्नेटोपॉज - टू - ऑरोरा ग्लोबल एक्सप्लोरेशन (इमेज) सेटेलाइट ने ये चौंकाने वाली खोज की है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सेटेलाइट 'क्लस्टर' ने इस खतरे की पुष्टि कर दी है। छेद तो ओजोन पर्त में भी है। फिर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में छेद इससे किस तरह अलग है? इसका क्या मतलब है ? और इससे पृथ्वी को क्या खतरा है? इन सवालों के जवाब जानने से पहले पृथ्वी के रक्षा कवच के बारे में कुछ तथ्यों को जानना जरूरी है।
खतरे में रक्षा कवच
ओजोन पर्त की तरह ही पृथ्वी को चारों ओर से घेरे चुंबकीय क्षेत्र भी हमारी धरती और इस पर फलते-फूलते जीवन के लिए एक बेमिसाल रक्षा कवच है। साइंटिस्टों ने 1980 में पता लगाया था कि पृथ्वी के वातावरण में प्रदूषण बढ़ने के कारण ओजोन की पर्त कमजोर पड़ रही है। ओजोन पर्त सूर्य की अल्ट्रावायलेट यानि पराबैंगनी किरणों को धरती पर पहुंचने से रोकती हैं। 1997 में पहली बार पता चला कि अंटार्कटिक के ऊपर ओजोन पर्त में एक छोटा छेद हो गया है। ओजोन पर्त के छेद को भरने के लिए तमाम कोशिशें की गईं लेकिन इसका अब तक कोई फायदा नहीं हुआ है। ओजोन पर्त में छेद का पता चलने के दस साल बाद अब एक दूसरी बुरी खबर आई है। धरती का चुंबकीय क्षेत्र भी खतरे में है। धरती का अपना एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र है। ये चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी को चारों ओर से घेरे रहता है। सूर्य जीवनदायी है, लेकिन जब रौद्र रूप धारण करता है तो इससे सौर विकिरण के भयंकर तूफान उत्पन्न होते हैं। सौर विकिरण के ये तूफान लाखों मील का सफर तय कर सौरमंडल में आगे बढ़ते चले जाते हैं। बुध और शुक्र के बाद इनके रास्ते में हमारी पृथ्वी आती है। लेकिन पृथ्वी को बगैर कोई नुकसान पहुंचाए सौर विकिरण का तूफान आगे बढ़ जाता है। क्योंकि हमारा चुंबकीय क्षेत्र सौर विकिरण के तूफान को पृथ्वी से परे ढकेल देता है। बुध और शुक्र ग्रह इसीलिए निर्जीव हैं क्योंकि सौर विकिरण के तूफानों की लगातार मार ने वहां जीने के लायक स्थितियां ही खत्म कर दी हैं। शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी का रक्षा कवच है जो सदियों से धरती पर जीवन की सुरक्षा कर रहा है। जानते हैं कि चुंबकीय क्षेत्र बनता कैसे है और इसमें छेद क्यों हो रहे हैं।
चुंबकीय क्षेत्र
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की खोज इसके गर्भ से ही शुरू होती है। इस रहस्य की चाभी पृथ्वी के आउटर और इनर कोर में छिपी है। पृथ्वी का इनर कोर बिल्कुल ठोस है, जबकि आउटर कोर लोहे और निकिल जैसी पिघली धातुओं के लावे से बना है। आउटर कोर में धातुओं के लावे का तापमान 7500 केल्विन ( 7000 से 12000 डिग्री फॉरेनहाइट) होता है। धरती के केंद्र या कोर का तापमान सूरज के तापमान से भी ज्यादा है। हमारे सौरमंडल के केंद्र सूर्य की सतह का तापमान केवल 6000 डिग्री केल्विन है। यानि हमारी धरती के केंद्र में ही एक सूरज छिपा हुआ है। सूर्य की तरह पृथ्वी का कोर भी नाभिकीय फिशन रिएक्टर की तरह काम करता है। चारों ओर लावे से घिरे पृथ्वी के ठोस इनर कोर को लगातार घूमने की ऊर्जा भी इसीसे मिलती है।
पृथ्वी की ठोस इनर कोर घड़ी की सूइयों की दिशा और इसके विपरीत बारी-बारी से घूमती रहती है। इनर कोर के इस प्रकार घूमने से ही पृथ्वी का शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। ये बिल्कुल डायनमो के घूमने से बिजली बनने जैसा ही है। पृथ्वी का शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र सौर विकिरण के घातक तूफानों को प्रतिकर्षण बल से परे धकेल देता है। चुंबकीय क्षेत्र कितना शक्तिशाली है ये कोर के घूमने की गति पर निर्भर करता है।
नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सेटेलाइट्स, इमेज और क्लस्टर ने पता लगाया है कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में छेद हो रहे हैं। इसका सीधा अर्थ ये है कि पृथ्वी के इनर कोर के घूमने की गति मंद पड़ रही है। जब भी ऐसा होता है चुंबकीय क्षेत्र कमजोर पड़ने लगता है और इसमें जगह-जगह छेद होने लगते हैं।
चुंबकीय क्षेत्र में छेद के खतरे
करीब हर तीन लाख साल बाद पृथ्वी के कोर का घूमना बंद हो जाता है। ऐसा होते ही पृथ्वी का रक्षा कवच चुंबकीय क्षेत्र अपने आप खत्म हो जाता है। यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के जियोफिजिसिस्ट गैरी ग्लाइट्जमेइर बताते हैं कि मंगल ग्रह के निर्जीव होने की एक वजह ये भी है कि उसके कोर का घूमना बंद हो चुका है। आज मंगल के चुंबकीय क्षेत्र के अवशेष ही बचे हैं। कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के जियोफिजिसिस्ट डेविड स्टीवेंसन का कहना है कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में छेद आने वाले खतरे की चेतावनी है। इससे साबित होता है कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र हर दिन कमजोर पड़ता जा रहा है। खतरा ये है कि चुंबकीय क्षेत्र के छेद से होकर सौर विकिरण और कास्मिक किरणें बेरोक-टोक सीधे धरती पर आएंगी। धरती पर जो इलाके इनके प्रभाव में आएंगे वहां कैंसर के मामले तेजी से बढ़ेंगे। इसके अलावा संचार व्यवस्था भी बार-बार ठप होगी।
सबसे बड़ा खतरा
नासा के नेशनल सेंटर फार एटमॉस्फियरिक रिसर्च (एनसीएआर) की साइंटिस्ट मौसमी दिग्पति और उनकी रिसर्च टीम ने बताया है कि एक बड़ा खतरा आने को है। सूर्य से सौर विकिरण का अब तक का सबसे बड़ा तूफान उठने वाला है। मौसमी दिग्पति और उनकी टीम की गणना है कि ये तूफान 2012 में पृथ्वी से टकराएगा।
नेशनल स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर ( एनएसएसटीसी) के सोलर फिजिसिस्ट डेविड हैथवे भी इससे सहमत हैं। लेकिन हैथवे का कहना है कि ये भयंकर सौर तूफान इससे पहले शायद 2010 या 2011 में ही पृथ्वी से आ टकराएगा।
सामान्य स्थितियों में सौर विकिरण के इस भयंकर तूफान से धरती पर कोई गंभीर नुकसान नहीं होता। क्योंकि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इस सौर तूफान के ज्यादातर घातक विकिरण को परे ढकेल देता। लेकिन अब स्थितियां पहले जैसी नहीं हैं।
पृथ्वी के सबसे मजबूत रक्षा कवच चुंबकीय क्षेत्र में छेद है और सूरज से सबसे भयंकर सौर विकिरण का तूफान उठने को है। जब रक्षा कवच कमजोर है तो इसका सीधा असर धरती और यहां फल-फूल रहे जीवन पर पड़ेगा। सौर विकिरण और कॉस्मिक किरणें चुंबकीय क्षेत्र के छेद से होकर सीधे धरती तक आएंगी। खतरे का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि अंतरिक्षयात्रियों को सौर विकिरण और कॉस्मिक किरणों से बचाने के लिए खास स्पेस सूट पहनाया जाता है। कॉस्मिक किरणें रास्ते में आने वाली हर चीज को भेदती हुई निकल जाती हैं। हमें एहसास भी नहीं होगा और कॉस्मिक किरणें हर पल हमारे मांस और हड्डियों को भेद रही होंगीं। ऐसा 2010 से 2012 के दौरान होगा। घरेलू और सेटेलाइट संचार व्यवस्था ठप हो जाएगी, टेलीविजन ट्रांसमिशन बाधित हो जाएगा, ध्रुवीय प्रदेशों में रात को नजर आने वाली पोलर लाइट्स शायद आधे ग्लोब तक दिखेंगी। अंतरिक्ष में तैर रहे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और दूसरे सेटेलाइट्स को नुकसान पहुंच सकता है और पृथ्वी के कुछ हिस्सों में शायद कैंसर के मामलों की बाढ़ आ जाएगी।
राहत की बात
धरती के इनर कोर के घूमने की रफ्तार लगातार कम होती जा रही है। इसी के साथ पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र भी लगातार कमजोर होता जा रहा है। पृथ्वी के इस रक्षा कवच में छेद इस बात की चेतावनी है कि अब वो दिन दूर नहीं जब चुंबकीय क्षेत्र पूरी तरह खत्म हो जाएगा। ऐसा कब होगा, इसकी तिथि और समय की घोषणा सही-सही नहीं की जा सकती। ये सौरमंडल की सबसे बड़ी दुर्घटना होगी, जो शायद कल भी घट सकती है या फिर एक हजार या एक लाख साल बाद।
सबसे बड़ी राहत की बात ये होगी कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र खत्म होगा और ठीक अगले ही सेकेंड ये फिर से उत्पन्न हो जाएगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि पिघली धातु के लावे से बना पृथ्वी का आउटर कोर ऐसे न्यूक्लियर रिएक्टर की तरह है जिसमें अरबों छोटी-छोटी नाभिकीय अभिक्रियाएं शुरू होती हैं, फिर बंद हो जाती हैं और फिर एक नए झटके के साथ शुरू हो जाती हैं। आउटर कोर में लगातार रुकती और शुरू होती नाभिकीय अभिक्रियाएं ही स्थिर हो चुके ठोस इनर कोर को फिर से घूमने के लिए जरूरी झटका देंगी। उम्मीद है कि इसके साथ ही इनर कोर का घूमना दोबारा शुरू हो जाएगा और पृथ्वी का खोया हुआ चुंबकीय क्षेत्र फिरसे वापस लौट आएगा। हां ये जरूर हो सकता है कि इस नए चुंबकीय क्षेत्र के ध्रुव बदल जाएं। जियोफिजिसिस्ट जे मार्विन हर्नडोन कहते हैं कि पृथ्वी के ध्रुवों में अंतिम बार परिवर्तन 780,000 साल पहले हुआ था। चुंबकीय क्षेत्र में छेद का पता चलने से ऐसा दोबारा होने की संभावना बढ़ गई है।
रहस्य को सुलझाने की कोशिश जारी
ये सच है कि हम सही-सही ये नहीं बता सकते कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र कितने दिनों का मेहमान है। लेकिन फिर भी साइंटिस्ट पता लगाने में जुटे हैं कि चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता किस दर से कम हो रही है। इसके लिए सदियों पुराने दस्तावेज फिर से पढ़े जा रहे हैं, खासतौर पर जहाजियों के।
इंग्लैंड के कैप्टन कुक ऐसे दुस्साहसी लोगों में से थे जिन्होंने 18 वीं शताब्दी में समुद्री जहाज से दुनिया का चक्कर लगाया था। साइंटिस्ट आज कैप्टन कुक और उससे भी पहले 16 वीं शताब्दी के जहाजियों के यात्रा रिकॉर्ड गहराई से जांच रहे हैं। इन जहाजों की तकदीर कुतुबनुमे पर टिकी होती थी। जिसकी मदद से वो समुद्र में अपनी सही दिशा खोजते थे। सदियों पहले दुनिया का चक्कर लगाने के लिए कैप्टन कुक ने उसी समुद्री रास्ते का चुनाव किया होगा जिस दिशा में उनके कुतुबनुमे ने इशारा किया। कुतुबनुमे की सूई उसी तरफ घूमी होगी जहां पृथ्वी की चुंबकीय रेखा सबसे प्रबल होगी। इस सिद्धांत की मदद से साइंटिस्ट लगातार बदलती चुंबकीय रेखाओं की प्रकृति जानने की कोशिश कर रहे हैं। इससे अब तक ये जरूर पता चला है कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का व्यवहार अब वैसा नहीं है जैसा कि सदियों पहले इन जहाजियों के वक्त हुआ करता था।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र धरती पर मौजूद हर चीज पर असर डालता है। हर पल एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र के घेरे में रहने के कारण धरती के कण-कण में चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। साइंटिस्ट अब धरती की सबसे पुरानी चट्टानों, गहरी खदानों और तेल कुओं की खुदाई के दौरान हजारों मीटर गहराई से निकली रेत और मिट्टी के नमूनों को प्रयोगशाला में जांचा जा रहा है। इनके चुंबकत्व की गणना की जा रही है और इस तरह पता लगाया जा रहा है कि बदलते वक्त से साथ पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का व्यवहार किस तरह बदल रहा है।
अब तक की गणना और आंकड़ों के हिसाब से पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र आने वाले कल से लेकर 2000 साल बाद कभी भी खत्म हो सकता है। ये सबसे खतरनाक वक्त होगा और तब पृथ्वी और इस ग्रह पर मौजूद जिंदगी सौर विकिरण और कॉस्मिक किरणों के वार झेलने को बेबस होगी। उम्मीद है कि ऐसा बेहद कम समय के लिए ही होगा। रुकने के बाद पृथ्वी का इनर कोर अपने आप दोबारा घूमने लगेगा और तब पृथ्वी के ध्रुव शायद वही रहें या बदल जाएं, लेकिन पृथ्वी का रक्षा कवच चुंबकीय क्षेत्र जरूर वापस आ जाएगा। ऐसा पहले भी हो चुका है और तब तमाम आसमानी आफतों के बावजूद मानव अपना अस्तित्व बचाने में सफल रहा था। यकीन रखिए कि इस बार भी हम लोगों को कुछ नहीं होगा।
संदीप निगम

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